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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

सर्वगात्मस्वरूपायाः प्रतिभाया इति स्थितिः । यथा राजात्मनि व्योम्नि प्रतिभोदेति सन्मयी ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

असत्य अनुभूतियाँ जीवाकाश में सत्यसी प्रतीत होती हैं । वैसे ही कुलवाले, वैसे ही सदाचारवाले, वैसे ही उच्च जन्मवाले, वैसी ही चेष्टावाले वे ही मन्त्री और पुरवासी तुम्हारी प्रतीति में आते हैं। वे परमार्थस्वरूप आत्मा में वे ही हैं, यों अत्यन्त सत्य हैं और अपने अपने देश, काल और चेष्टा की दृष्टि से तुल्य हैं ४६, ४७॥ सभी जगह ऐसी ही चैतन्य की स्थिति है, ऐसा कहते हैं । जिसका आत्मस्वरूप सर्वगामी है, ऐसी प्रतिभा की यही स्थिति है। शंका : ईश्वर की प्रतिभा के अनुसार पदार्थों का निर्माण पहले सुना गया है, जीवप्रतिभा तो अथनुसार ही उदित होती है, यदि ऐसा न माना जाय, तो मनोरथ से कल्पित पदार्थ सबके प्रति समानरूप से सत्य हो जायेंगे । इसलिए केवल राजा की प्रतिभामात्र से पदार्थो की सिद्धि कैसे होगी और उसमें अन्य जीवों की समानरूप से व्यवहार योग्यता कैसे होगी ? समाधान : राजारूप आत्मा में जैसी सन्मयी यानी सर्वसाधारण के लिए सत्यपदार्थवाली प्रतिभा उदित होती है, वैसे ही उससे पहले सर्वसाधारण भोक्ताओं के अदृष्ट से अव्याकृत आकाशरूप ईश्वर में सत्यसंकल्परूप प्रतिभा उत्पन्न होती ही है, इसलिए पूर्वोक्त दोष के लिए अवकाश नहीं हे