Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 27–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 27–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 27-31
संस्कृत श्लोक
एवं न सन्नासदिदं भ्रान्तिमात्रं विभासते ।
महाकल्पान्तसंपत्तावप्यद्याथ युगेऽनघ ॥ २७ ॥
न कदाचन यन्नास्ति तद्ब्रह्मैवास्ति तज्जगत् ।
तस्मिन्मध्ये कचन्तीमा भ्रान्तयः सृष्टिनामिकाः ॥ २८ ॥
व्योम्नि केशोण्ड्रकानीव न कचन्तीव वस्तुतः ।
यथा तरङ्गा जलधौ तथेमाः सृष्टयः परे ॥ २९ ॥
उत्पत्त्योत्पत्त्य लीयन्ते रजांसीव महानिले ।
तस्माद्भ्रान्तिमयाभासे मिथ्यात्वमहमात्मनि ॥ ३० ॥
मृगतृष्णाजलचये कैवास्था सर्गभस्मनि ।
भ्रान्तयश्च न तत्रान्यास्तास्तदेव परं पदम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले दोनों की सत्यता का उपपादन किया था, यहाँ पर असत्यता का उपपादन किया,
यों दोनों की ही अनिर्वचनीयता तुल्य है ऐसा कहते हैं।
इस प्रकार यह स्वप्न और जाग्रत् जगत् न सत् है ओर न असत् है, केवल भ्रान्तिमात्र ही
प्रतीत होता हे ।
इस प्रकार सृष्टिकाल और प्रलयकालमे अवशिष्ट सद्रूप ब्रह्म सिद्ध हुआ, ऐसा कहते है ।
महाकल्प का अन्त होने पर ओर आज भी ओर आगे भी यानी अतीत वर्तमान ओर अनागत
युगो में भी जो कभी भी नहीं था, नहीं है और नहीं होगा, वह स्वरूपतः नहीं हे, किन्तु उसका
कल्पना का अधिष्ठान ब्रह्म ही है; अत: वही जगत् है, भासमान अब्रह्मरूप जगत् नहीं है ।
उसी ब्रह्म में ये सृष्टिनामक भ्रान्तियाँ विकास को प्राप्त होती हैं, जैसे कि आकाशमें केशोण्ड्रक
(केशों का वर्तुलाकार गोला ) प्रतीत होता है, पर वास्तव में वह आकाश से अतिरिक्त नहीं है,
आकाश रूप ही हे ये सृष्टियाँ परब्रह्म में वास्तव में स्फुरण को भी नहीं सी प्राप्त होती हैं।
चिदाकाश को नहीं ही प्राप्त होती हैं, ऐसा कहना चाहिए था, सद्ृशार्थक “इव” शब्द का
प्रयोग प्रपंच के समान ब्रह्म से अतिरिक्त प्रपंच का अभाव भी मिथ्या है, यह सूचन करने के
लिए है।
जैसे समुद्र में लहर उत्पन्न होती हैं, वैसे ही परब्रह्म में ये सृष्टियाँ उत्पन्न हो होकर
महापवन में (आँधी में) धूलिकणों के समान लीन हो जाती है । इसलिए त्वम्, अहम्, जगत्
इस प्रकार विभागस्वरूप भ्रान्तिमय प्रतीत होनेवाले, मृगतृष्णा जलरूप तथा जलाये गये वस्त्र
की भस्म के तुल्य प्रपंच में कौन सा आदर है ?
शंका : पूर्वोक्त रीति से अत्यन्त तुच्छ विषयों का बाध होने पर भी भ्रान्तिरूप ज्ञान के
स्वरूप का बाध न होने से उससे द्वैत होगा ही ।
समाधान : विषय बाध होने पर आन्तियाँ (अम-ज्ञान) ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं रहती, वे
भ्रान्तियाँ परम पद रूप ब्रह्म ही है । भाव यह है कि निर्विषय ज्ञानो का परस्पर से और ब्रह्म से
भेद करानेवाला कोई है नहीं, इसलिए वे ब्रह्ममात्र ही हैं