Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
यथा ज्ञप्तिरुदेत्यन्तस्तथानुभवति क्षणात् ।
चितिश्चेत्यार्थतामेति चित्तं चित्तार्थतामिव ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
चितिशक्तियाँ अचिन्तनीय हैं, तुल्य कर्मो से उद्बोधित पदार्थों का कहीं पर समान ही
आविभवि होता है, यों देवी द्ृष्टिसृष्टिवाद का अवलम्बन कर समाधान करती है ।
श्रीदेवी ने कहा : हे लीले, भीतर जैसा ज्ञान उदित होता है, वैसा ही क्षणभर में बाहर
पदार्थो का अनुभव होने लगता है । जैसे मन स्वप्न आदि में चित्त द्वारा अनुभूत जाग्रत्
पदार्थो के आकार को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही चिति अध्यास द्वारा चेत्याकारता को प्राप्त
होती है