Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 35–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 35–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 35-40
संस्कृत श्लोक
जीवाणुर्यत्र तत्रेदं जगद्वेत्ति निजं वपुः ।
अग्निरौष्ण्यं यथा वेत्ति निजभावक्रमोदितम् ॥ ३५ ॥
पश्यतीदं तथैवात्मा स्वात्मभूतं विशुद्धचित् ।
यथा सूर्योदये गेहे भ्रमन्ति त्रसरेणवः ॥ ३६ ॥
तथेमे परमाकाशे ब्रह्माण्डत्रसरेणवः ।
यथा वायौ स्थितः स्पन्द आमोदः शून्यमम्बरे ॥ ३७ ॥
पिण्डग्रहविनिर्मुक्तं तथा विश्वं स्थितं परे ।
भावाभावग्रहोत्सर्गस्थूलसूक्ष्मचराचराः ॥ ३८ ॥
विवर्जितस्यावयवैर्भागा ब्रह्मण ईदृशाः ।
साकारस्यावबोधाय विज्ञेया भवताधुना ॥ ३९ ॥
अनन्याः स्वात्मनस्तस्य तेनानवयवा इव ।
यथास्थितमिदं विश्वं निजभावक्रमोदितम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
वासना के बल से आत्मा में अनात्मा का अध्यास होनें मे दृष्टान्त कहते हैं।
पहले अग्नि से भिन्न होता हुआ भी उपासक 'मैं अग्नि हूँ” इस प्रकार उपासनरूप अपनी
भावना के क्रम से उदित हुआ यानी उपासना के फलरूप से आविर्भूत उष्णता का जैसे अनुभव
करता है, वैसे ही विशुद्ध चैतन्य आत्मा इस जगत् को आत्मभूत देखता है। जैसे सूर्योदय
होने पर घरमें त्रसरेणु घूमते हैं, वैसे ही परमाकाश में ये ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु घूमते हैं | जैसे
वायु मेँ स्पन्द ओर आमोद (गंध) स्थित है और आकाश में शून्यता स्थित है, वैसे ही स्थूलता
से शून्य यह विश्व परब्रह्म में स्थित है। अवयवों से शून्य ब्रह्म के आविर्भाव, तिरोभाव,
उपादान, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर ओर अचर ऐसे भाग हैं । इस समय साकार विश्व के
निराकारत्वज्ञान के लिए उन्हें आपको वैसी अपनी आत्मा से अभिन्न से यानी आत्मा के
अनवयव से आपको जानना चाहिए । इस प्रकार अपनी भावना के क्रम से उत्पन्न हुआ यह
विश्व यथास्थित है