Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 49–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 49–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 49-52
संस्कृत श्लोक
तथा तदग्रगोदेति सत्येव प्रतिभाम्बरे ।
त्वच्छीला त्वत्समाचारा त्वत्कुला त्वद्वपुर्मयी ॥ ४९ ॥
इति लीलेयमाभाति प्रतिभाप्रतिबिम्बजा ।
सर्वगे संविदादर्शे प्रतिभा प्रतिबिम्बति ॥ ५० ॥
यादृशी यत्र सा तत्र तथोदेति निरन्तरम् ।
जीवाकाशस्य यान्तस्था प्रतिभा कुरुते स्वयम् ।
सा बहिश्च चिदादर्शे प्रतिबिम्बादियं स्थिता ॥ ५१ ॥
एषा त्वमम्बरमहं भुवनं धरा च राजेति सर्वमहमेव विभातमात्रम् ।
चिद्व्योमबिल्वजठरं विदुरङ्ग विद्धि त्वं तेन शान्तमलमास्स्व यथास्थितेह ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से प्रतिभा के प्रतिबिम्ब से उत्पन्न हुई यह लीला तुम्हारे सरीखे शील,
सदाचार, कुल और शरीर से युक्त प्रतीत होती हे । सर्वव्यापक संवित्रूपी दर्पणमें प्रतिभा
प्रतिबिम्बित होती हे । वह जहाँ पर जैसी होती है, वहाँ पर वैसी ही सदा उदित होती है, उसका
अन्यथाभाव कदापि नहीं होता | सर्वान्तर्यामी ईश्वर की प्रतिभा जो भीतर है, वही स्वयं बाहर
भी कार्य करती है, इसलिए चित् रूपी दर्पण में प्रतिबिम्ब होने से यह तुम्हारे सदुश स्थित हे ।
तात्पर्य यह है कि उसी के बाह्य होने के कारण सम्पूर्ण पदार्थ में सामान्यदृश्यता की उपपत्ति
होती हे । आकाश, उसके अन्तर्गत भुवन, भुवन के अन्तर्गत पृथिवी, उसके अन्तर्गत यह तुम
मैं और राजा ये सब चिन्मात्रस्वभाव मेँ यानी प्रत्यग्रूप ही है । इसी प्रकार ओर भी तत्त्वज्ञ पुरूष
सब पदार्थो को चिदाकाशरूपी बिल्वफल की सत्तामात्र जानते हें, वे सब चिदाकाश से अतिरिक्त
नहीं हैं । हे लीले, तुम भी वैसे ही जानो । उक्त ज्ञान से स्वस्वभाव में स्थित होकर तुम यहाँ
अत्यन्त होकर (विक्षेपशून्य होकर) रहो