Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
मृतिर्जन्मन्यसद्रूपा मृत्यां जन्माप्यसन्मयम् ।
विशरेद्विशरारुत्वादनुभूतेश्च राघव ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरी बात यह भी है कि परस्पर काल मे असत्ता भी दोनो मे समान है, यानी जाग्रत्काल'
में जैसे स्वप्न की असत्ता है वैसे ही स्वप्नकाल में जाग्रत् की भी असत्ता है, ऐसा कहा है ।
नाश में भी बाध की नाई परस्पर के काल में न रहना समान है, ऐसा कहते हैं ।
जन्मसमय में मृत्यु असद्रूप है और मृत्युसमयमें जन्म भी असन्मय है, नाश में अवयवों के
विसरणशील होने के कारण द्रव्य का विनाश होता है, बाध में अनुभूति के बल से द्रव्य विनष्ट
होता है, इस प्रकार निमित्त भेद होने पर भी विशरण में विशेष नहीं है, यह भाव है