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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

इति नो येयमायाता शाखा प्रसरशालिनी । आपत्तामलमुद्धर्तुं देवस्यैवास्ति शक्तता ॥ ११ ॥ इत्याकर्ण्यावलोक्यासौ देव्यौ युद्धाय याम्यतः । क्षम्यतां मम भार्येयं युष्मत्पादाब्जषट्पदी ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, इस प्रकार जो यह शाखा-प्रशाखाओं के विस्तार से युक्त आपत्ति हम लोगों के ऊपर आई है, उसका समूल निवारण करने में केवल महाराज ही समर्थ है । महारानी की सखी के मुँह से यह सुनकर राजा ने देवियों की (सरस्वती और लीला की) ओर देखकर कहा : देवियों, चूँकि ऐसा विपत्तियोंका पहाड़ हमारे परिजनों पर टूट पड़ा है, अतः मैं युद्ध करने के लिए समरभूमि में जाता हूँ। आप क्षमा करें । मेरी अनुपस्थिति में मेरी यह पत्नी आप लोगों के चरणकमलों की सेवा करेगी, आप इसकी रक्षा करना, ऐसा अभिप्राय है