Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 10
24 verse-groups
- Verse 1दसवाँ सर्ग श्रीवसिष्ठजी के समझाने पर राजा दशरथ द्वारा श्रीरामचन्द्रजी को अन्तःपुर से बुलव…
- Verse 2दशरथ ने कहा : हे प्रतीहार, अमोघ (सफल) पराक्रमवाले आजानुबाहु श्रीरामचन्द्र को महर्षि विश्व…
- Verses 3–5इस प्रकार राजा दशरथ द्वारा भेजा गया द्वारपाल अन्तःपुर में स्थित श्रीरामचन्द्रजी के निवासस…
- Verses 6–8श्रीरामचन्द्रजी के विषय में द्वारपाल द्वारा ऐसा समाचार पाकर राजा दशरथ प्रतीहार के साथ आये…
- Verses 9–11कमलपत्र के समान नेत्रवाले श्रीरामचन्द्रजी ब्राह्मणो के साथ जबसे तीर्थयात्रा कर घर वापस लौ…
- Verses 12–15जैसे मेघ की धाराओं के साथ चातक खेलकूद (क्रीडा) करता है, वैसे आँगन में झूला झुलानेवाली अन्…
- Verses 16–20हाव-भाव, लावण्य, विलास आदि से शोभित नृत्य करनेवाली अन्तःपुर की अंगनाओं को देखकर दुःखदायिन…
- Verse 21किसी उच्चवंशी पुरुष को, नीच जाति के पुरुषों में क्रीतदास होने पर जैसे एकान्त निर्जन प्रदे…
- Verse 22राजन्, वस्त्र, पान, भोजन, दान आदि से विमुख होकर श्रीरामचन्द्रजी संन्यास धर्म से दीक्षित…
- Verses 23–25महाराज, रामचन्द्रजी जनशून्य देश मेँ एकाकी होकर रहते हैं और वहाँ मन लगाकर न हँसते हैं, न र…
- Verses 26–27हम लोग यह नहीं जानते कि वे कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, किसका अनुसरण करत…
- Verse 28राजन्, सर्वदा श्रीरामचन्द्र का अनुसरण करनेवाले शत्रुघ्न और लक्ष्मण भी श्रीरामचन्द्रजी के…
- Verse 29नौकरों के, राजाओं के और माताओं के बार बार पूछने पर भी “कुछ नहीं" एसा प्रत्युत्तर देकर ओर…
- Verse 30अपने समीप के विवेकी मित्रों को यह उपदेश देते हैँ कि इन ऊपर-ऊपर से सुन्दर दीखनेवाले क्षणिक…
- Verses 31–34अनेक प्रकार के आभूषणं से सुन्दर, विलासस्थान में अवस्थित रमणियों को अपने सामने खडी देखकर उ…
- Verses 35–36यदि शंका हो कि गुणादि के उत्कर्ष से विस्मययोग्य वस्तु मेँ विस्मय करना ही उचित है, अतः उसक…
- Verses 37–39श्लोकस्थ दो अपि शब्द आकाशअरण्य और आकाशकमलिनी की असंभावना सूचित करने के लिए हैं। जैसे मेघ…
- Verse 40रघुवंशरूप महाअरण्य में शाल वृक्ष के समान, शत्रुओं का मर्दन करने में समर्थ श्रीरामचन्द्रजी…
- Verse 41हे महाबाहो, इस प्रकार शोक से परिपूर्ण अन्त:करणवाले श्रीरामचन्द्रजी के विषय में हमें क्या…
- Verses 42–43यदि यहाँ पर यह शंका हो कि राजनीति आदि व्यवहारो को जाननेवाले बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा रा…
- Verses 44–47हैं और न मुक्त ही है, उन्हें ऐसा देखकर हम लोग बड़े दुःखी या अत्यन्त परितप्त होते है
- Verse 48(आशा पराधीन विषयों में होती है और स्वाधीन विषयों में आस्था होती है, यो आस्था ओर आशा का भे…
- Verses 49–50हे प्रभो, उस प्रकार के स्वभाववाले श्रीरामचन्द्रजी को समग्र वैभवों से परिपूर्ण यह संसाररूप…
- Verse 51जैसे भास्कर (सूर्य) अपने भास्करपनको इस पृथ्वी पर गिरनेवाले अन्धकारका नाशकर सफल बनाता है,…