Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 37–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 37-39
संस्कृत श्लोक
आपदामेकमावासमभिवाञ्छसि किं धनम् ।
अनुशिष्येति सर्वस्वमर्थिने संप्रयच्छति ॥ ३७ ॥
इयमापदियं संपदित्येवं कल्पनामयः ।
मनसोऽभ्युदितो मोह इति श्लोकान्प्रगायति ॥ ३८ ॥
हा हतोऽहमनाथोऽहमित्याक्रन्दपरोऽपि सन् ।
न जनो याति वैराग्यं चित्रमित्येव वक्त्यसौ ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्लोकस्थ दो अपि शब्द आकाशअरण्य और आकाशकमलिनी की असंभावना सूचित करने के
लिए हैं।
जैसे मेघ की धाराएँ बड़े भारी पत्थर का भेदन नहीं कर सकती, वैसे ही कामदेव अनेक सुन्दर
स्त्रियों के बीच में रहने पर भी श्रीरामचन्द्रजी के मन का अपने बाणों से भेदन नहीं कर सकता ॥ ३ ६॥
“आपत्तियों के प्रधान निवासस्थानरूप धन को क्यों चाहता है ?' - ऐसी शिक्षा देकर श्रीरामचन्द्रजी
अपना सम्पूर्ण धन याचकों को दे देते हैं। और यह आपत्ति है, यह सम्पत्ति है, यह सब केवल कल्पनाओं
से भरा हुआ, मन से उठा हुआ भ्रम है, ऐसे श्लोकों को खूब गाते हैं। हा मैं मर गया और मैं अनाथ हो
गया, इस प्रकार लोक क्रन्दन तो करते हैं, पर वैराग्य को प्राप्त नहीं होते, यह बड़ा आश्चर्य हे ।* - ऐसा
ही कहते हैं