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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

इति तोके समायातां शाखाप्रसरशालिनीम् । आपत्तामलमुद्धर्तुं समुदेतु दयापरः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

(आशा पराधीन विषयों में होती है और स्वाधीन विषयों में आस्था होती है, यो आस्था ओर आशा का भेद समझना चाहिए। रामचन््रजी मेँ विवेक है, अतः वे मूढ नहीं कहे जा सकते और आत्मविश्रान्ति उनमें नहीं हि, अतः मुक्त नहीं कहे जा सकते, इसलिए वे न मूढ हैं और न मुक्त हैं, ऐसा इस श्लोक से कहा गया है । धर्म से क्या होगा ? माताओं से क्या होगा, इस विस्तृत राज्य से कौन प्रयोजन सिद्ध होगा, किसी झूठी वस्तु की इच्छा से क्या ? इस प्रकार का निश्चय करके प्राण त्याग करने की इच्छा कर रहे हैं अर्थात्‌ राग आदि दोष ही जन्म ओर मरणरूप दुःख के कारण है, अतः मरने से ही मेरी मुक्ति होगी, यों निश्चय करके प्राणत्याग करने के लिए उत्सुक हो रहे हैं, यह भाव है ।) जैसे वृष्टि का प्रतिबन्ध होने पर चातक पक्षी अत्यन्त उद्विग्न हो जाता है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी भोग, आयुष्य, राज्य, मित्र, पिता और माता के विषय में अत्यन्त उद्विग्न हो गये हैं ४ ७॥ महाराज, यों आपके पुत्र श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर अनेक प्रकार की चिन्ता, कृशता आदि विविध शाखा-प्रशाखा के रूप से विस्तारपूर्वक आई हुई विपत्तिरूप लताका समूल उच्छेद करने में परम दयालु आप ही उद्योग करें