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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 12–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

लोलान्तःपुरनारीभिः कृतदोलाभिरङ्गणे । नच क्रीडति लीलाभिर्धाराभिरिव चातकः ॥ १२ ॥ माणिक्यमुकुलप्रोता केयूरकटकावलिः । नानन्दयति तं राजन्द्यौः पातविषयं यथा ॥ १३ ॥ क्रीडद्वधूविलोकेषु वहत्कुसुमवायुषु । लतावलयगेहेषु भवत्यतिविषादवान् ॥ १४ ॥ यद्द्रव्यमुचितं स्वादु पेशलं चित्तहारि च । बाष्पपूर्णेक्षण इव तेनैव परिखिद्यते ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मेघ की धाराओं के साथ चातक खेलकूद (क्रीडा) करता है, वैसे आँगन में झूला झुलानेवाली अन्तःपुर की चपल अंगनाओं के साथ श्रीरामचन्द्रजी कभी क्रीडा भी नहीं करते । जैसे थोड़े समय में स्वर्ग से गिरनेवाले पुरुष को स्वर्गीय भोग-सामग्री आनन्द नहीं देती, वैसे ही मुकुल के सदृश आकारवाले माणिकों से जडित सुन्दर केयूर ओर कटक भी उन्हें आनन्द नहीं देते । क्रीडा करनेवाली सुन्दर रमणियों के कटाक्षरूपी बाणों के समान बहनेवाले सुगन्ध पूर्ण पुष्प की वायु से युक्त लताओं के निकुजो में भी सदा उदासीन विषण्ण रहते हैं । जो पदार्थ उपभोग में लोक और शास्त्र से अविरुद्ध, मनोहर, स्वादिष्ट और कोमल हैं, उनसे भी अश्रुपूणनित्र के समान खिन्न हो जाते हैँ