Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
भृत्यै राजभिरम्बाभिः संपृष्टोऽपि पुनः पुनः ।
उक्त्वा न किंचिदेवेति तूष्णीमास्ते निरीहितः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
नौकरों के,
राजाओं के और माताओं के बार बार पूछने पर भी “कुछ नहीं" एसा प्रत्युत्तर देकर ओर अपने
अभिप्राय की सूचक चेष्टाओं को न कर चुप हो जाते हैं ।