Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 3–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
इति राज्ञा विसृष्टोऽसौ गत्वान्तःपुरमन्दिरम् ।
मुहूर्तमात्रेणागत्य समुवाच महीपतिम् ॥ ३ ॥
देव दोर्दलिताशेषरिपो रामः स्वमन्दिरे ।
विमनाः संस्थितो रात्रौ षट्पदः कमले यथा ॥ ४ ॥
आगच्छामि क्षणेनेति वक्ति ध्यायति चैकतः ।
न कस्यचिच्च निकटे स्थातुमिच्छति खिन्नधीः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार राजा दशरथ द्वारा
भेजा गया द्वारपाल अन्तःपुर में स्थित श्रीरामचन्द्रजी के निवासस्थान में जाकर और मुहूर्तमात्र में वापस
आकर राजा से कहने लगा : अपनी भुजाओं से शत्रुसमूह का मर्दन करनेवाले हे देव, रात्रि होने पर भ्रमर
जैसे कमल में उदास होकर बैठा रहता है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी अपने निवासस्थान में अत्यन्त उदास
होकर बैठे हुए हैं । थोडी देर में आता हूँ, ऐसा कहकर फिर किसी वस्तु का ध्यान करने लग जाते हैं,
उनको इतनी ग्लानि हो गई हे कि वे किसी के निकट ठहरना भी नहीं चाहते