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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 26–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 26,27

संस्कृत श्लोक

न विद्मः किमसौ याति किं करोति किमीहते । किं ध्यायति किमायाति कथं किमनुधावति ॥ २६ ॥ प्रत्यहं कृशतामेति प्रत्यहं याति पाण्डुताम् । विरागं प्रत्यहं याति शरदन्त इव द्रुमः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

हम लोग यह नहीं जानते कि वे कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, किसका अनुसरण करते हे । जेसे शरत्‌ ऋतु की समाप्ति में वृक्ष की अवस्था होती हे, वैसे ही श्रीरामचन्द्र प्रतिदिन दुबले-पतले और पीले होते चले जा रहे हैं और उत्तरोत्तर उनका वैराग्य बढ़ता ही चला जा रहा है