Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 31–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 31–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 31-34
संस्कृत श्लोक
नानाविभवरम्यासु स्त्रीषु गोष्ठीगतासु च ।
पुरस्थितमिवास्नेहो नाशमेवानुपश्यति ॥ ३१ ॥
नीतमायुरनायासपदप्राप्तिविवर्जितैः ।
चेष्टितैरिति काकल्या भूयोभूयः प्रगायति ॥ ३२ ॥
सम्राड्भवेति पार्श्वस्थं वदन्तमनुजीविनम् ।
प्रलपन्तमिवोन्मत्तं हसत्यन्यमना मुनिः ॥ ३३ ॥
न प्रोक्तमाकर्णयति ईक्षते न पुरोगतम् ।
करोत्यवज्ञां सर्वत्र सुसमेत्यापि वस्तुनि ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक प्रकार के
आभूषणं से सुन्दर, विलासस्थान में अवस्थित रमणियों को अपने सामने खडी देखकर उनके प्रति
रनेहरहित श्रीरामचन्द्रजी विनाश की ही धारणा करते हैँ । हम लोगों ने अपनी आयु परम पद की
प्राप्ति के बिना यों ही निरर्थक अनेक तरह की चेष्टाओं के द्वारा व्यतीत कर दी, इस प्रकार मधुर
और स्पष्ट वाणी से श्रीरामचन्द्रजी बार वार गान करते हैं । यदि कोई समीपस्थ अनुचर उन्हें यह
कहे कि आप सम्राट हो, तो उसके कथन को उन्मत्तप्रलाप की नाईं समझकर दूसरी ओर चित्त करके
हँसते हैं किसी के वाक्य को न सुनते हैं और न सामने की वस्तु को देखते हैं । गुणादि से युक्त
विस्मयोत्पादक उत्तम वस्तु के प्राप्त होने पर भी उसकी अवज्ञा करते हैं