Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 9–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
रामो राजीवपत्राक्षो यतःप्रभृति चागतः ।
सविप्रस्तीर्थयात्रायास्ततःप्रभृति दुर्मनाः ॥ ९ ॥
यत्नप्रार्थनयास्माकं निजव्यापारमाह्निकम् ।
सोऽयमाम्लानवदनः करोति न करोति वा ॥ १० ॥
स्नानदेवार्चनादानभोजनादिषु दुर्मनाः ।
प्रार्थितोऽपि हि नातृप्तेरश्नात्यशनमीश्वरः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
कमलपत्र के समान नेत्रवाले श्रीरामचन्द्रजी ब्राह्मणो के साथ जबसे तीर्थयात्रा
कर घर वापस लौटे हैं, तब से वे अत्यन्त खिन्न रहते हैँ । आम्लान (कुम्हलाये) शरीरवाले श्रीरामचन्द्रजी
हम लोगों की बारबार प्रार्थना से अपने सन्ध्यावन्दन भोजन आदि कार्य कभी करते हैं और कभी नहीं भी
करते है । स्नान, देवपूजन, दान, भोजन आदि में सदा उदास रहते हैं और प्रार्थना करने पर भी तृप्तिपर्यन्त
भोजन नहीं करते