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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 16–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 16–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 16-20

संस्कृत श्लोक

किमिमा दुःखदायिन्यः प्रस्फुरन्तीः पुराङ्गनाः । इति नृत्तविलासेषु कामिनीः परिनिन्दति ॥ १६ ॥ भोजनं शयनं यानं विलासं स्नानमासनम् । उन्मत्तचेष्टित इव नाभिनन्दत्यनिन्दितम् ॥ १७ ॥ किं संपदा किं विपदा किं गेहेन किमिङ्गितैः । सर्वमेवासदित्युक्त्वा तूष्णीमेकोऽवतिष्ठते ॥ १८ ॥ नोदेति परिहासेषु न भोगेषु निमज्जति । न च तिष्ठति कार्येषु मौनमेवावलम्बते ॥ १९ ॥ विलोलालकवल्लर्यो हेलावलितलोचनाः । नानन्दयन्ति तं नार्यो मृग्यो वनतरुं यथा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

हाव-भाव, लावण्य, विलास आदि से शोभित नृत्य करनेवाली अन्तःपुर की अंगनाओं को देखकर दुःखदायिनी ये सब क्या कर रही है" इस प्रकार उनके नृत्य आदि विलासो की ओर कटाक्ष करके श्रीरामजी उन कामिनियों की निन्दा करते है । भोजन, शयन, यान (सवारी), विलास, स्नान, आसन आदि के निर्दोष होने पर भी उन्मत्त की तरह उनकी अवहेलना करते हैँ । “सम्पत्ति से, विपत्ति से, घर से ओर अन्यान्य व्यापारो से क्या होनेवाला है, क्योकि ये सब असत्‌ है, अधिक दिन तक रहनेवाले नहीं है, नश्वर हैं ।” - ऐसा कह कर फिर चुप हो जाते हैं और एकाकी रहते हैं । परिहास से प्रसन्न नहीं होते, भोगों मेँ आसक्त नहीं होते, कार्यो में सहयोग नहीं करते ओर किसी प्रकार के कार्यारम्भ में आस्था नहीं रखते, किन्तु मोन ही रहते है । जैसे चपल नेत्रवाली हरिणियाँ वृक्ष को आनन्द नहीं देती, वैसे ही जिनके केशों में पुष्प ओर रत्नों की मंजरियाँ लगी हैं, श्रृंगार की हाव-भाव आदि चेष्टाओं और कटाक्ष से जिनके नेत्र तिरछे हैं, ऐसी ललनाएँ उन्हें आनन्द नहीं देती