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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 23–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

एक एव वसन्देशे जनशून्ये जनेश्वर । न हसत्येकया बुद्ध्या न गायति न रोदिति ॥ २३ ॥ बद्धपद्मासनः शून्यमना वामकरस्थले । कपोलतलमाधाय केवलं परितिष्ठति ॥ २४ ॥ नाभिमानमुपादत्ते न च वाञ्छति राजताम् । नोदेति नास्तमायाति सुखदुःखानुवृत्तिषु ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, रामचन्द्रजी जनशून्य देश मेँ एकाकी होकर रहते हैं और वहाँ मन लगाकर न हँसते हैं, न रोते हैं और न गाते हैँ, किन्तु पद्मासन लगाकर और अपने वाये हाथमे कपोल रखकर किसी ऊँची वस्तु का ध्यान लगाये बैठे रहते हे । इष्ट ओर अनिष्ट पदार्थो के मिलने पर न हर्ष ओर विषाद करते हैं, न अभिमान करते हैं ओर न राज्य की इच्छा ही करते हें