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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

एकान्तेषु दिगन्तेषु तीरेषु विपिनेषु च । रतिमायात्यरण्येषु विक्रीत इव जन्तुषु ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी उच्चवंशी पुरुष को, नीच जाति के पुरुषों में क्रीतदास होने पर जैसे एकान्त निर्जन प्रदेश ओर अरण्य आदि में रहना अच्छा लगता है, वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी को एकान्त में, नदी के तीर में, दिगन्त में ओर निर्जन अरण्य प्रदेश में रहना अच्छा लगता है