Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 10, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
राजानमथवा विप्रमुपदेष्टारमग्रतः ।
हसत्यज्ञमिवाव्यग्रः सोऽवधीरयति प्रभो ॥ ४२ ॥
यदेवेदमिदं स्फारं जगन्नाम यदुत्थितम् ।
नैतद्वस्तु नचैवाहमिति निर्णीय संस्थितः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यहाँ पर यह शंका हो कि राजनीति आदि व्यवहारो को जाननेवाले बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा
रामचन्द्रजी को उपदेश दिलाओ, जिससे उनका सारा मोह नष्ट हो जाय, तो इस शंका का अनुचर
समाधान करता है।
प्रभो, राजनीति आदि व्यवहारों के उपदेशक राजा और अच्छे ब्राह्मण पण्डितों को अपने आगे देखकर
रामचन्द्रजी अव्यग्र होकर उनकी हँसी उड़ाते हैं अर्थात् उनका किसी प्रकार का सम्मान न कर तिरस्कार
करते हैं। बाह्य दृष्टियों से अनेक प्रकार का दीखनेवाला यह विस्तृत जगत् विनाशी ही है। यह अहमाकार
वृत्ति से गम्य परमार्थ (परमात्मरूप) वस्तु नहीं है, किन्तु उससे भिन्न असत् वस्तु है, ऐसा निर्णय करके
उसके जिज्ञासु होकर चुपचाप अवस्थित रहते हैं