Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 90
नवासीवाँ सर्ग समाप्त नत्वेवों सर्म पृथ्वी के अन्दर अनन्त जगतों की दृष्टि तथा जलधारणा से समस्त जललीलाओं का पूर्ववत् वर्णन।
31 verse-groups
- Verse 1जेर प्रसिद्ध जग्रत् में चॉदी की शिला आदि विभिन्न ग्रदेशों में अनेक ब्रह्ाण्डदहिकेेही धार…
- Verse 2इस श्लोक में मण्डलशथब्द को प्रदेश भेद का काचक समझना चाहिए / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, प…
- Verse 3क्या देखा क्या अनुभव किया 2 इसे कहते हैं / पहले देखी गई चाँदी की शिला के सदृश ही यानी चाँ…
- Verse 4केंसे द्रेतनय है ओर कैसे शान्त अद्वैतरूप है 2 इस पर कहते हैं / सभी स्थानों में जगत् हैं…
- Verse 5सर्वत्र पृथ्वी आदि स्थूल पदार्थ हैं और यथार्थ में वह कुछ नहीं भी है, अनुत्पन्न स्वप्ननगर…
- Verse 6एक; अनेक या सत्य वस्तु अब सिद्ध हो सकती है, जब एक, अनेक आदि का दर्शन करनेवाला दर्शनाभिमान…
- Verse 7राघव, यद्यपि यह दृश्य सत् और अहम्" (मैं) इत्यादि रूपसे अनुभूत होता है, तथापि उसका अस्ति…
- Verse 8इस रीति से जब दृश्यों में प्रतियोगी अस्तित्वका स्थान नहीं है, तब अस्तित्व के अभाव नास्तित…
- Verse 9श्रीरामभद्र ने जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर देकर अब जलःधारणा बॉधकर जो कुछ कौतुक देखा था,…
- Verse 10हे राघव, मैं यद्यपि चेतनरूप ही हूँ, फिर भी मैं जलधारणा से जड़रूपसा बन गया। तदनन्तर जलरूप…
- Verse 11जैसे आपके अंगो में जँ आदि नजर बचाकर मन्दगति से चढ़ जाती है, ठीक ऐसे ही मैं तृण, वृक्ष, लत…
- Verse 12सूक्ष्म तन्तु के आकार के एक छोटे कीड़े को (काँतर को) कर्णाहि कहते हैं । वह जैसे मन्दगति स…
- Verse 13लताओं ओर तमाल, ताल आदि पेड़ों के पल्लवो तथा फलों में रसरूप से विश्राम कर काल से पुष्ट (उन…
- Verse 14जीवों की देहों मे जलपान के समय मुख के द्वारा हृदय में प्रवेश कर बसन्त आदि ऋतुओं के कारण ह…
- Verse 15तनिक भी खेद (थकावट) का अनुभव न करनेवाले हिमकणका रूप धारण किये हुए मैंने एक ही समय में समस…
- Verse 16जो हनद अनेक नदियों के घर हैं यानी मार्ग के निवासस्थान (विश्रामगृह) हैं, उनका आश्रय करते ह…
- Verse 17सदश वर्तन करता हुआ खूब उल्लास करता रहा
- Verse 18प्रायश्चित्त के निमित्त भृगुपतन में प्रवृत्त हुए पापी के सदृश पर्वतं की ऊपर की शिलाओं से…
- Verse 19लकड़ियों से धूम्र के रूपमें निकलकर मैं आकाशरूपी समुद्र में नीले रंग के नक्षत्र मणियों के…
- Verse 20काटी हुई इन्द्रनील मणि के सदृश नीलवर्णवाले भगवान् विष्णु लक्ष्मीजी के साथ शेषनाग के अंगो…
- Verse 21परमाणुमय सृष्टि में यानी पिपीलिका आदि परमसूक्ष्म देहात्मक सृष्टि में तत्-तत् प्राणियों…
- Verse 22भद्र, मैं मधुर रसरूप भी तो बन गया था । रसरूप बनकर मैंने जिह्लारूप अणुओं के साथ संसर्ग प्र…
- Verse 23कुछ लोग विषय को ही आनन्दरूप ओर आस्वाद लेने योग्य मानते हैं; परन्तु यह मानना उवित नहीं हैं…
- Verse 24अथवा, विष्य स्वादयोग्य हैं. यदि यह पक्ष हैं, तो उसमें विष्याधिष्ठान चेतन के द्वारा आस्वाद…
- Verse 25भद्र, यद्यपि मैं यथार्थ में अजड़रूप ही हूँ, फिर भी कल्पनावश जड़ जलरूप होकर मैं ने चौदह प्…
- Verse 26राघव, मैंने जलकणका रूप भी धारण किया था । उस रूपको धारणकर मैंने पवनरूपी रथपर चढ़कर निर्मल…
- Verse 27वहाँ भी परमाणु तक की स्री वस्तुओं में हर एक जगह. वाकी की शिलाके सदश, सृष्टियों का मैंने अ…
- Verse 28एकमात्र जल को विषय करनेवाली एकरूप उस जलधारणा से स्वयं अजड़ होता हुआ भी जड़ जल-सा बनकर तथा…
- Verse 29हर एक वस्तु के अन्दर जो जयत् देखे उनके भी भीतर के प्रत्येक पदार्थ में वैसे ही अन्य अन्य…
- Verse 30यद्यपि अधिष्ठान विति कल्पित अनन्त जगतो से व्याप्र है, तथापि उसमें किसी तरह की भी मलिनता न…
- Verse 31रागी द्वारा देखे जानेवाले जयत् में भी उक्त न्याय को लगाते हुए सक्के अधिष्ठानभूत शुद्ध चि…