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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

सर्वोत्थानोपमास्तम्भे तच्छेदे वलयोपमा । मृद्व्या कर्णाहिगत्येव रचना प्रकृतोदरे ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

सूक्ष्म तन्तु के आकार के एक छोटे कीड़े को (काँतर को) कर्णाहि कहते हैं । वह जैसे मन्दगति से छिपे-छिपे आकर कान में घुस जाता है । बस ठीक उस कीड़े के सदृश मैंने अत्यन्त मृदु गति से छिपे छिपे उन तृण, वृक्ष आदि के तनों मे, तृणादि की उर्ध्वस्थिति के सदृश, ऊर्ध्वस्थिति की तथा उनके पोरों और छिद्रो मे कोमल वलयाकारवाली (गेंडुली-सी) रचना भी की