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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यावत्तथैव सर्वत्र जगज्जालमवास्थितम् । सर्वं दृश्यमयं शान्तमपि द्बैतमयात्मकम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

क्या देखा क्या अनुभव किया 2 इसे कहते हैं / पहले देखी गई चाँदी की शिला के सदृश ही यानी चाँदी की शिला में मेने जैसे समस्त जगत्‌ देखे थे, वैसे ही धारणा से दृष्ट भूमण्डल के सभी स्थानों मेँ जगत्‌जाल-सा स्थित मैंने देखा । समस्त दृश्यमान द्वैतमय होता हुआ भी यथार्थ में शान्त अद्वैत ही है