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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

सर्वर्तुरसरूपेण नानामोदानि दिक्ष्वलम् । भुक्तानि पुष्पजालानि प्रोच्छिष्टं ददतालये ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा, विष्य स्वादयोग्य हैं. यदि यह पक्ष हैं, तो उसमें विष्याधिष्ठान चेतन के द्वारा आस्वादित ही विषयों को दूसरे चखते हैं; जो कि उसके उच्छिष्टप्राय हैं; यही कल्पना हो, इस आशय से कहते हैं / समस्त ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाला जो रस है, तद्रूप बनकर भ्रमरोंको उच्छिष्ट रस देते हुए मैंने सब दिशाओं में अनेक तरह के आमोदों से पूर्ण फूलों का खूब उपभोग किया