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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

न किंचनत्वं च न किंचनेदं शुद्धः परो बोध इदं विभाति । स चापि नो किंचन नापि शून्यमाकाशमेवासि विकासमास्व ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

रागी द्वारा देखे जानेवाले जयत्‌ में भी उक्त न्याय को लगाते हुए सक्के अधिष्ठानभूत शुद्ध चिन्मात्र वस्तु में श्रीयमणी की प्रतिष्ठा कराते हैं / आप कुछ नहीं हैं यानी न आपकी तीन अवस्थाएँ हैं और न देह, इन्द्रिय आदि ही हैं, न यह कुछ है यानी न आकाश आदि बाहरी प्रपंच ही है, किन्तु परम विशुद्ध बोध ही इस जगत्‌ के रूप में भासता है । वह-शोधित "तत्‌" “त्वम्‌” पदार्थरूप-बोध भी वास्तव में कुछ नहीं है यानी न तो वह दृश्य-स्वभाव है, न अदृश्य स्वभाव है ओर न अदृश्यशून्य स्वभाव है, किन्तु अखण्डाकाशरूप है । वही आप हैं । इसलिए आप उक्त आत्मरूप बनकर उत्तरोत्तर विकास प्राप्त कर लें