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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

नेह नानास्ति नो नाना न नास्तित्वं न चास्तिता । अहमित्येव नैवास्ति यत्र तत्र कुतोऽस्ति किम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

एक; अनेक या सत्य वस्तु अब सिद्ध हो सकती है, जब एक, अनेक आदि का दर्शन करनेवाला दर्शनाभिमानी सार में प्रसिद्ध हो, परन्तु ऐसा दर्शनाभिमानी ही नहीं है, ऐसा कहते हैं / भद्र, इस प्रपंच में जब न तो नाना (अनेक) वस्तु है, न अनाना (एक) वस्तु है, न अस्तित्व है और न नास्तित्व ही है अधिक क्या कहें-जो “अहं' (मैं) शब्द से दर्शनादि का अभिमानी कहा जाता है, वह भी नहीं है । जब वह भी नहीं है, तब कैसे कौनसी वस्तु है ?