Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
प्राप्य जिह्वाणुभिः सङ्गमनुभूतिः कृतोत्तमा ।
यामात्मनो न देहस्य मन्ये ज्ञानस्य केवलम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मैं मधुर रसरूप भी
तो बन गया था । रसरूप बनकर मैंने जिह्लारूप अणुओं के साथ संसर्ग प्राप्त किया । संसर्ग
प्राप्त कर रसास्वादरूपी उनकी वह उत्तम अनुभूति की, जिसे मैं देह की नहीं मानता, किन्तु
केवल ज्ञानरूप आत्मा की मानता हूँ, अर्थात् वह अनुभूति विषयानन्द के आकार में आविर्भूत
आत्मा का स्वरूप है, वह मैं मानता हूँ