Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
एवं जगच्चाजगद्वा साकारं वा निराकृति ।
चिन्मात्रगगनं सर्वमाकाशाधिकनिर्मलम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि अधिष्ठान विति कल्पित अनन्त जगतो से व्याप्र है, तथापि उसमें किसी तरह की भी
मलिनता नहीं है यह कहते हैं /
इस रीति से जगत् हो चाहे न हो, साकार हो चाहे निराकार हो, सभी अवस्थाओं में सब केवल
चितिरूप आकाश ही है, यह प्रसिद्ध आकाश से अधिक निर्मल है