Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परात्मजाग्रत्स्वप्नोर्वीमण्डलौघात्मना मया ।
ततोऽनुभूतं हृदये दृष्टं च परया दृशा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इस श्लोक में मण्डलशथब्द को प्रदेश भेद का काचक समझना चाहिए /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, पृथ्वीधारणा से परमात्मा के जाग्रतपृथ्वीमण्डल और
स्वप्नपृथ्वीमंडल समूहरूप बनकर मैंने तत्-तत् पृथ्वी के प्रदेशविशेषरूप उसके हृदय में जो
कुछ साक्षिदृष्टि से देखा और मन से विचारपूर्वक अनुभव किया, उसे कहता हूँ, सुनिए । स्वप्न
का ग्रहण स्वप्न की पृथ्वी के अनेक प्रदेशों में भी अनन्त जगत् का अवलोकन हो सकता है,
यह बतलाने के लिए किया गया हे