Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
जगन्ति सन्ति सर्वत्र सर्वत्र ब्रह्म संस्थितम् ।
सर्वं शून्यं परं शान्तं सर्वमारम्भमन्थरम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
केंसे द्रेतनय है ओर कैसे शान्त अद्वैतरूप है 2 इस पर कहते हैं /
सभी स्थानों में जगत् हैं और सभी जगह ब्रह्म भी स्थित है तथा सब-कुछ शून्यात्मक एवं
परमशान्तरूप है और सब अनेक तरह के आरम्भं से पूर्ण भी है