Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 74
तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चोहत्तरवों सर्ग जो लोक उस ब्रह्मा के अंगभूत हैं जो उसके पृथक्-पृथक् अवयव हैं तथा जिस तरह ये सब इसके अन्दर स्थित हैँ -इन सबका वर्णन।
32 verse-groups
- Verse 1उस ब्रह्मा का कोन अंग यह भरूलोक है ओर कोन अगर स्वर्ग अथवा पाताल है 2 इस विभायग्रश्न का, (…
- Verse 2उम्र विराट् का ब्रह्म ही वास्तविक स्वरूप प्राथमिक और अकल्पित हैं / उस विराट का शरीर तो उ…
- Verse 3आदि, मध्य ओर अन्त से राहित चिदाकाश ही उका स्वरुप है, यह आप कैसे जानते हैं. इस पर कहते हैं…
- Verse 4उस विराटात्मा का चिर. पैर और नितस्व बतलाने के लिए सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड के ऊपर तथा नीचे के…
- Verses 5–6उस अणु के ऊपर के एक भाग को उसने ऊर्ध्वगत आकाश समझ लिया तथा नीचे का भाग जो स्थित था उसे उस…
- Verse 7बहुत दूर विभक्त हुए उन कपालखण्डं की अति विस्तृत जो मध्य सन्धि है वह अनन्त-शून्य श्यामवर्ण…
- Verse 8अन्तरिक्ष उस विराट् पुरुष का विशाल तालु है, तारागण रूधिर के विन्दु हैं तथा देह में सुर,…
- Verse 9भूत, प्रेत, पिशाच आदि उसके शरीर के भीतर रहनेवाले रक्त माँस आदि अपवित्र पदार्थो के लोलुप य…
- Verse 10इस भूमण्डल के नीचे का ब्रह्माण्डखण्ड उसके पैर का विस्तृत तलवा है और नीचे जो पाताल गर्त है…
- Verse 11जलों से चलायमान सूराखों से पूर्ण, अनेक छिद्रोंवाली, काम, रोग, जरा, मरण आदि से व्याकुल तथा…
- Verse 12जलो से गुड-गुड शब्द करनेवाली नदियाँ उसकी नाड़ीयाँ हैं तथा नदियों का जल उसके शरीर का रस है…
- Verse 13शून्य दिशाएँ उसके कूक्षिभाग हैं, सभी पर्वत उसके यकृत- प्लीहादि हैं और मेघसमूह उसके कोमल त…
- Verse 14चन्द्रमा ओर सूर्य उसके नेत्र हे, ब्रह्मलोक उसका मुख कहा गया है, सोम उसका वीर्य तथा हिमालय…
- Verse 15अग्निलोक तथा पृथिवी के अन्दर की अग्नि इसका अतिदुःसह पित्त है । वातस्कन्धो में प्रसिद्ध जो…
- Verse 16कल्पवृक्षं के वन, पाताल आदि में प्रसिद्ध साँपों के झुण्ड तथा वन एवं उपवन इस विराट् पुरुष…
- Verse 17ब्रह्माण्ड के खण्ड का सम्पूर्णं ऊर्ध्वभाग इसका विशाल मस्तक है । ब्रह्माण्ड के ऊर्ध्वप्रान…
- Verse 18(५) देखिये यह श्रुति “अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्टेषु सर्वतः इस्र प्रका…
- Verse 19इसी तरह इन्हें इन्द्रियों की अस्तिता इनसे अन्यां में - हम लोगों मे कल्पित है । और वे सब इ…
- Verse 20तब इन्द्रिय और मन में भेवव्यवहार क्यों होता हैं, इस पर कहते हैं / अवयव और अवयवी के सदृश ए…
- Verse 21यही कारण हैं कि सम्पूर्ण जग्रत् की करिया भी उसी की किया है, इसलिए किया के विष्य में अलग…
- Verse 22तब तो हम लोगों का मरण और जन्म भी उसी के मरण और जन्म हे / ऐसी स्थिति में द्रिपरार्ध काल तक…
- Verse 23क्यों यह सब कुछ व्रह्मा ही हे 2 इस पर कहते हैं / उसकी सत्ता से जगत् की सत्ता तथा उसके मर…
- Verse 24वायु और उसके स्पन्द के समान जगत् और विराट् पुरुष की सत्ता एक ही है । जो पृष्टेंष्वनुत्त…
- Verse 25जगत्, ब्रह्मा ओर विराट्-ये तीनों एक अर्थ के वाचक शब्द हैं तथा ये दोनों यानी विराट् और…
- Verse 26(अस्तु नाम“ यहाँ तक के पदसे महाराज वस्तिष्ठजी का कथन स्वीकार करते हुए श्रीरामचन्द्रणी अवश…
- Verse 27महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मानसपूजा करते समय ध्यान लगाकर हृदय में कल्पित रत्न…
- Verse 28स्थूल वेहात्मक अपने हृदयकमल में लिंग देहात्सक अपनी अवस्थिति सी विवेकियों को अनुभव प्रिद्ध…
- Verse 29कैमुतिक न्याय से अपने शरीर के अन्दर विधाता की स्थिति बतलाते हैं / जबकि आप भी अपने स्थूल श…
- Verse 30जब स्थावरों में भी अपने कीज से अन्य शरीर धारण करने की सामर्थ्य विद्यमान है, तब भला सर्वधक…
- Verse 31स्वरूप से बाहर स्थित हैं अतः वे भिन्न है अर्थात् इन्हींका भेद होता है, आन्तर सद्रूप की ज…
- Verse 32अच्छा तो वह विराट पुरुष बाहर और भीतर किस प्रकार हैं और वस्तुतः किस स्वभाव में वह स्थित रह…
- Verse 33केवल ऐसी स्थिति विदयट् पुरुष की ही हैं, यह बात नहीं है किन्तु सभी तत्वज्नानियो की भी ऐसी…