Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
जागते तस्य विज्ञेये नान्येऽस्य मृतिजन्मनी ।
स एवेदं जगत्यस्मत्संकल्पात्मास्य नेतरत् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो हम लोगों का मरण और जन्म भी उसी के मरण और जन्म हे / ऐसी स्थिति में द्रिपरार्ध
काल तक उसके जीवन की जो ग्रप्निद्धि है उसमें विरोध होने लगेगा, इस आशंका पर कहते हैं /
समष्टि जगत् के यानी समस्त जगत् के जन्म और मरण को ही उस ब्रह्मा का जन्म ओर मरण
समझना चाहिए, हमारे-जैसे व्यक्तिविशेष के जन्म ओर मरण को उस ब्रह्मा का जन्म ओर मरण
नहीं जानना चाहिए, क्योकि जगत् में समष्टिरूप वही है तथा हम लोगों का जो संकल्प है तद्रूप भी
वही है । उस ब्रह्मा का समष्टि तथा व्यष्टि से अतिरिक्त और कोई दूसरा रूप ही नहीं है