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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

आवेष्टितोज्झितलतातृणदारुपुंवदुच्छब्दमम्बुरयवच्च विरोपिताङ्गः । नानाविधेऽपि विहरन्नपि कार्यजाले तज्ज्ञः शिलाजठरशान्तमनस्क एव ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल ऐसी स्थिति विदयट्‌ पुरुष की ही हैं, यह बात नहीं है किन्तु सभी तत्वज्नानियो की भी ऐसी ही स्थिति है, यह दिखलाने के लिए उसी स्थिति का द्रष्टातों द्रा साफ साफ वर्णन करते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, न केवल विराट्‌ पुरुष, किन्तु सभी तत्त्वज्ञानी पुरुष लता, तृण, काष्ठपुरुष या प्रतिमा के समान पहले रत्न आदि से आबद्ध हो पुनः मुक्त हो जाने पर भी कुपित नहीं होते, बल्कि चुपचाप स्थित रहते हैं तथा जल के प्रवाह के सदृश अवरुद्ध ओर छिन्न -भिन्न अंग होने पर भी अपनी प्राक्तन शान्त स्थिति को नहीं छोड़ते एवं नाना प्रकार के कार्यसमूह में विहार करते हुए भी शिला के उदर के समान क्रोधाविरहित शान्तचित्त ही स्थित रहते है- क्रोध, हर्ष, विषाद आदि से तनिक भी विकार को प्राप्त नहीं होते