Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
बीजान्तः स्थावरं ह्यास्ते पदार्थे यत्र जंगमः ।
किं नास्ते तत्र देहेऽन्तर्निजचित्कल्पनात्मिका ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जब स्थावरों में भी अपने कीज से अन्य शरीर धारण करने की सामर्थ्य विद्यमान है, तब भला
सर्वधक्तिस्र्पन्न विति की कल्पनारुप ब्रह्ममूर्ति के विषय में कया कहना है, यह कहते हैं /
जब स्थावर पदार्थ भी बीज के भीतर स्थित रहते हैं तब भला जंगम सर्व शक्तिमान् ब्रह्माजी
अपनी देह के भीतर क्यों नहीं स्थित रह सकते, जो स्वयं चिति की कल्पनारूप हैं