Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
स्वयमेष मनस्तेन मनो नास्योपयुज्यते ।
आत्मैव भोक्तृतामेति किल कस्य कथं कुतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
(५) देखिये यह श्रुति “अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्टेषु सर्वतः
इस्र प्रकार अपने विराट् शरीर की कल्पना करनेवाले उस विराट् पुरुष का कोन मन और कोन
उन््रिया हे, इस पर कहते हैं /
चूँकि समस्त समष्टि मन के आत्मा ये विधाता स्वयं मनरूप ही हैं, इसलिए इनकी सभी
कल्पनाओं मेँ किसी दूसरे मन का इन्हे उपयोग नहीं करना पड़ता । मनरूप विधाता को भी किसी
दूसरे मन की आवश्यकता होने पर अनवस्था हो जायेगी। जब यह निश्चित है कि एकमात्र आत्मा
ही भोक्तृता को प्राप्त होता है तब भला किसका (८) कहाँ से कैसे संभव हो ?