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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तस्मिन्कल्पे तु संकल्पे तस्य यद्वपुरास्थितम् । श्रृणु तत्र व्यवस्थेयं विचित्राचारहारिणी ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उस ब्रह्मा का कोन अंग यह भरूलोक है ओर कोन अगर स्वर्ग अथवा पाताल है 2 इस विभायग्रश्न का, (कथ वाोऽन्तरे तस्य“ इस ्रश्न का तथा (कथ वा तन्मनोमात्र निराकृतिरिवं स्थितम्‌“ इस प्रश्न का भी विस्तार के साथ उत्तर देने के लिए अब महाराज वस्तिष्ठजी श्रोता को सावधान कर रहे हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उस शिला के उदर में देखे गये ब्रह्मकल्परूपात्मक उस विराट्‌ के संकल्प में जो ब्रह्माण्डात्मक शरीर स्थित है उसकी विचित्र आचारों से चित्त को हर लेनेवाली जो यह जन्म, कर्म, अवयव आदि की व्यवस्था है, वह आप सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चोहत्तरवों सर्ग जो लोक उस ब्रह्मा के अंगभूत हैं जो उसके पृथक्‌-पृथक्‌ अवयव हैं तथा जिस तरह ये सब इसके अन्दर स्थित हैँ -इन सबका वर्णन।