Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
आत्मारामः काष्ठमौनी न जडोऽपि दृषज्जडः ।
अहंत्वमित्यादिमयो विराडात्मनि तिष्टति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अच्छा तो वह विराट पुरुष बाहर और भीतर किस प्रकार हैं और वस्तुतः किस स्वभाव में वह
स्थित रहता है, यह कहते हैं /
वही विराट् पुरुष बाहर ब्रह्माण्ड रूपसे स्थित है तथा भीतर "अहं, त्वम् इत्यादि व्यष्टि
एवं समष्टिभूत भौतिकमय है । लेकिन अपने स्वरूप में तो आत्माराम होकर भी वह काष्ठवत्
मौनी तथा पत्थर के समान जड़ होकर भी वस्तुतः वह चिदेकरसरूप होने के कारण जड़रूप
से स्थित नहीं है