Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 6
पाँचवाँ सर्ग समाप्त छठा सर्ग चिरकाल तक दिव्य भोग को भोगे हुए विद्याधर के द्वारा परीक्षित विषयों में उन्मुख इन्द्रियों की नीति का वर्णन ।
54 verse-groups
- Verse 1अतः वार साधनों से सम्पन्न मुझ ब्ह्यजिज्ञायु को हे व्रह्मन्. आप ब्ह्मोपदेश दीजिये, यह कहत…
- Verse 2(हे भगवान्, मैं तिविधताप से अत्यन्त सन्तप्त हँ। अतएव सागर में डूबने की इच्छा कर रहे सन्त…
- Verse 3हे भगवन्, मैं मन के महाभयंकर रोग काम से पीडित हूँ, अज्ञान की वृत्तियों दुर्वासनाओं से क्…
- Verse 4विद्याधर तो सम्पूर्ण विद्याओं के आश्रय होने से अपने विद्याबल से ही समस्त दुःखो को दूर करन…
- Verse 5॥ ज्ञान का अभाव रहने पर धर्मानुष्ठान में अधिकार न होने से देवयोनियाँ मच्छरआदि योनियों के…
- Verse 6अत्यन्त तुच्छ सुख के लिए हजारों बार पहले उपभुक्त हुए शब्दादि विषयों से धोखे की टट्टीरूप (…
- Verse 7कहीं एक जगह मन को स्थिर किये बिना मरुस्थल के सदृश क्षणभंगुर इन भोगों में भ्रमण कर रहे मेर…
- Verse 8भोग की भूमियाँ आरम्भ में आपाततः रमणीय प्रतीत होती हैं। क्षण में ही विलीन हो जाती हैं, उनस…
- Verse 9बहुत अधिक पुण्यो से प्राप्तवविद्याधर प्रम्पत्ति से ही दु्हें विश्रान्ति क्यो नही मिल रही…
- Verses 10–13श्क्तभोगरी होने के कारण सवत्र नीरसता दिखलाते है / जहाँ कल्पवृक्ष -वल्ली द्वारा अनेक तरह क…
- Verse 14किस तरह के विवेकज्ञान से किस-किसका कैसे-कैसे परिज्नान किया, इसको पहले चश्च आदि उदरियो में…
- Verse 15स्त्री के शरीर के यह वस्त्र, आभूषण सिन्दूर आदि ही सौन्दर्य उत्पन्न करनेवाले है, रक्त-मांस…
- Verse 16तत्-तत् विषयों मेँ आसक्ति रखने से दूषित हुआ रागान्ध यह चित्त, दीपक के रूप से मोहित प्रे…
- Verse 17नेत्रों में कहे गये भेदो को प्राण आदि डइन्द्रियों में भी दिखलाते हैं / हे तात्, इस संसार…
- Verse 18अतिदोषयुक्त कोई प्रबल शत्रु जबर्दस्ती पकड़कर जैसे किसी पुरुष को दुर्गन््धपूर्ण जल बहानेव…
- Verse 19तथा बहुत दिनों से भक्ष्याभक्ष्य के विचार से हीन इस जिह्ना ने पशुओं में सबसे बलवान् हाथिय…
- Verse 20भगवन्, त्वगिन्द्रिय की स्पर्शलम्पटता को मैं ऐसे रोक नहीं सकता, जैसे ग्रीष्मकाल के प्रदीप…
- Verse 21हे मुने, सुन्दर शब्द का आस्वाद लेने की अभिलाषावाली श्रवण की शक्तियो मुझे विषम परिस्थिति म…
- Verse 22तो क्या रुग से लेकर शब्दपर्यन्त सभी विषय तुम्हे दुर्लभ थे, जिसे कि उनके लिए दुम्हें अनर्थ…
- Verse 23अपने विषयों से सबका मन हरनेवाली तथा मनोहर शब्दोंवाले मणियों के आभूषणों से युक्त श्री, स्त…
- Verse 24विनीत स्त्रियों द्वारा लाये गये,मधुर आदि रसों के अनेक चमत्कारो से मनोरम, यथायोम्य मिलाने…
- Verse 25रेशमी मुलायम वस्त्रों, सुन्दर कान्ताओं, अनेक तरह के हारो, पुष्पशय्याओं तथा शीतल-मन्द-सुगन…
- Verse 26हे मुने, सुन्दर स्त्रियों के मुख, चन्दन, खस, अगुरु आदि औषधियाँ अनेक तरह के फूल तथा ढेर-के…
- Verse 27हे मुने, मैंने शब्दादि विषयों का खूब श्रवण, स्पर्श और अवलोकन किया । विविध रसों का खूब आस्…
- Verse 28तृण, गुल्म आदि से लेकर ब्रह्मापर्यन्त के परिणाम में दुःखदायक विषयों का मैंने हजारों वर्षो…
- Verse 29चिरकाल तक निष्कपट राज्य करके, अनेक सुन्दरियों का भोग करके तथा शत्रुओं के सैन्य को खूब चूर…
- Verse 30भगवन्, जिन हिरण्यकशिपु आदि राजाओं ने तीनों लोक का चिरकाल तक लगातार मनमाना भोग किया तथा ज…
- Verse 31ऐसी स्थिति में मनुष्य को क्या करना चाहिये, यह कहते &ै/ जिसके प्राप्त हो जाने से फिर कोई द…
- Verse 32बिरकाल तक अनेकाविध बड़े-बड़े भोगो का भोग करनेवाले पुरुषों में भी भ्ोगक्राल समाप्त हो जाने…
- Verse 33दुःख से त्याज्य होनेवाली इस विषयरूपी महाजंगल की पंक्तियों में बहुत दिन पहले ही इन इन्द्रि…
- Verses 34–35शब्दादि विषयरूप भूत ही मन को बाहर खींचकर अपने-अपने भोगों के लिए श्रोत्र आदि भाव से स्थित…
- Verse 36जिनकी तालू के अन्दर भयंकर विष भरा रहता है ऐसे इन विषय और इन्द्रियरूपी साँपों से जो नहीं ड…
- Verses 37–39इन्हें अवश्य जीतना चाहिये, यह दिखलाने के लिए इन्द्रियों का ही शत्रु की सेनारूप से वर्णन क…
- Verse 40मतवाले ऐरावत का मस्तक फाड़ देना बिलकुल सरल है, लेकिन हे मुनीश्वर, कुमार्ग में प्रवृत्त अप…
- Verse 41हे साधो, तत्त्वज्ञानियों की भी अपने पौरुष, महत्त्व, महाधेर्य ओर विश्रान्तिसम्पत्ति की अवध…
- Verse 42मनुष्य तभी तक देवताओं की भी मान्यता को प्राप्त करता है जब तक कि तृण की नाई अपनी कृपण इन्द…
- Verse 43हे भगवन्, जो मनुष्य जितेन्द्रिय ओर महासत्त्व सम्पन्न हैं वे ही पृथिवी के ऊपर मनुष्य हैं।…
- Verse 44हे मुने, मनरूपी सेनापति की इन्द्रियपंचकरूपी इस सेना को जीतने का यदि कोई उपाय हो, तो कृपाक…
- Verse 45युझे तो एक ही उपाय मालूम हैं, इसे कहते है / भोगों की आशा के त्याग के सिवा इन इन्द्रियरूपी…
- Verse 46विषयों की ओर दौड़ रही इन इन्द्रियों ने मुझे परम खेद में ऐसे पहुँचा दिया है, जैसे महाभयंकर…
- Verse 47इसके बाद तुल्य विशेषणों द्वारा पल्वल आदि के साम्य से इन्द्रियों का वर्णन करते हैं / कीचड़…
- Verse 48दुरतिक्रमणीय जाड्य ओर हिमों से गहन तथा अनेक तरह का आतंक पैदा करनेवाले ये जंगल और इन्द्रिय…
- Verse 49पंक से उत्पन्न तथा पंक के उत्पादक, छिद्रयुक्त, अत्यन्त दुर्लक्ष्य गुण (वासना और तन्तु) वा…
- Verse 50रुक्ष रत्नलुब्ध, तरगों से युक्त और दुर्ग्रह ग्राहों से भयंकर, लवणसागर के जल और ये इन्द्रि…
- Verse 51बान्धवों को उद्वेग पहुँचानेवाले, अन्य शरीर धारण करानेवाले और करुणा से क्रन्दन करानेवाले य…
- Verse 52अविवेकियों के शत्रु और विवेकियों के मित्र, गहन, निरवधि तथा जनविश्रान्तिशून्य ये कानन और इ…
- Verse 53घन आस्फोटवाले असार, मलिन, जड़ और विद्युत् प्रकाशवाले (८) ये भयंकर मेघ और इन्द्रियसमुदाय…
- Verse 54क्षुद्र प्राणियों से गृहीत, महात्माओं से वर्जित तथा रज और तम से अभिभूत (%) अपनी ये इन्द्र…
- Verse 55नीचे गिराने में अत्यन्त निपुण, दोषाशीविषवाले (73) तथा रूखे लाखों कण्टकां से (७) युक्त जीर…
- Verse 56हे महामुने, अपने पेट पालने में प्रवीण, अनार्य, एकमात्र साहस मेँ निरत और अन्धकार में विचरण…
- Verse 57भीतर में खोखले, असार, वक्र, गठयुक्त, एकमात्र जलाने में उपयोगी जीर्णं बाँस आदि की लकड़ियाँ…
- Verse 58घनीभूत मोहादि के द्वारा चौर्य, कलह, दूत आदि दुर्व्यसनों में प्रबन्धनशील, दुष्टकूपों से गह…
- Verse 59कारणभूत, भ्रमण और कीचड़ से युक्त ये कुम्हार के चाक ओर इन्द्रियों दोनों समान हैं
- Verse 60हे आपत्ति से उवारनेवाले भगवन्, इस तरह इन्द्रियों के कारण आपत्ति के सागर में डूबे हुए इस…