Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verses 37–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 37-39
संस्कृत श्लोक
भोगभीमेभवलितां तृष्णातरलवागुराम् ।
लोभोग्रकरवालाढ्यां कोपकुन्तकुलाङ्किताम् ॥ ३७ ॥
द्वन्द्वजालरथव्याप्तामहंकारानुपालिताम् ।
चेष्टातुरंगमाकीर्णां कामकोलाहलाकुलाम् ॥ ३८ ॥
शरीरसीमान्तगतां दुरिन्द्रियपताकिनीम् ।
ये जेतुमुत्थितास्तात त एवेह हि सद्भटाः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्हें अवश्य जीतना चाहिये, यह दिखलाने के लिए इन्द्रियों का ही शत्रु की सेनारूप से वर्णन
करते हैं ।
हे तात, इस दुष्ट इन्द्रियरूपी सेना को जीतने के लिए कमर कसकर जो खड़े है वे ही इस
संसार में सर्वोत्कृष्ट योद्धा हैँ । यह दुष्ट इन्द्रियरूपी सेना भोगरूपी भयंकर हाथियों से युक्त है,
तृष्णारूपी चंचल वागुरा (हिरन फंसाने का जाल) से युक्त है, लोभरूपी उग्र तलवारों से पूर्ण है,
कोपरूपी बरछियों से अंकित है, शीतोष्णादि द्रनद्रसमूहरूपी रथ से व्याप्त है, अहंकररूपी सेनापति
से सुरक्षित है, चेष्टारूपी घोड़ों से यह भरी है, कामरूपी कोलाहलों से युक्त है और यह शरीररूपी
नगर के सीमान्त को चारों ओर से आक्रान्त कर स्थित है