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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

एतावन्तमहं कालं सुप्त आसं जडात्मकः । इदानीं संप्रबुद्धोऽस्मि प्रसादादात्मनो मुने ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

(हे भगवान्‌, मैं तिविधताप से अत्यन्त सन्तप्त हँ। अतएव सागर में डूबने की इच्छा कर रहे सन्तप्त प्रिखाले पुरुष की नाई अब मुझसे विलम्ब सह नहीं जाता /) यदि दुम्हारी ऐसी स्थिति है, तो फिर पहले ही कर्यो नहीं आये 2 इस पर कहते है । हे मुने, इतने काल तक जडात्मा बनकर मैं गाढ़ निद्रा में सोया हुआ था । अब मन की तीव्रतर वैराग्यरूपी प्रसन्नता से जाग गया हूँ