Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
घ्राणमेतदनर्थाय धावच्चैवामितः स्फुटम् ।
न निवारयितुं तात शक्नोमीह हयं यथा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्रों में कहे गये भेदो को प्राण आदि डइन्द्रियों में भी दिखलाते हैं /
हे तात्, इस संसार में अनेकविध अनर्थो के लिए चारों ओर खूब दौड़ रहे इस घ्राण को
अश्व की नाई रोकने में मैं समर्थ नहीं हो रहा हूँ