Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
तावदायाति विरतिं न वशं यावदापदाम् ।
नानाबन्धपरं चेतः परानर्थेहितोन्मुखम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्-तत् विषयों मेँ आसक्ति रखने से दूषित हुआ रागान्ध यह चित्त, दीपक के रूप से मोहित
प्रेमी पतंग की नाईं सर्वोत्कृष्ट मरण आदि अनर्थ के लिए अपने ईच्छित दुर्व्यसनों की ओर
झुककर जब तक नानाविध वध, बन्धन, नरक आदि आपत्तियों के वश में पड़ा रहता है तब
तक इसे कहीं भी शान्त नहीं मिलती