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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

मानावमानपरया दुरहंकारकान्तया । न रमे वामया तात हतविद्याधरश्रिया ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

बहुत अधिक पुण्यो से प्राप्तवविद्याधर प्रम्पत्ति से ही दु्हें विश्रान्ति क्यो नही मिल रही ह ? इस आशंका पर कहते हैं । हे तात, मेँ इस तुच्छ विद्याधर सम्पत्ति से सन्तुष्ट नहीं हो रहा हूँ। मैं इसके साथ रमण करना नहीं चाहता, क्योकि मान ओर अपमान ही इसमें बड़ी वस्तुएँ हैं । दुष्ट अहंकार से ग्रस्त जीवों के लिए ही यह अच्छी है और विवेकी पुरुषों के लिए सदा प्रतिकूल है