Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
येन कान्ताश्चिरं भुक्ता भोगास्तस्येह जन्तुभिः ।
दृष्टो न कस्यचिन्मूर्ध्नि तरुर्व्योमप्लवश्च वा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
बिरकाल तक अनेकाविध बड़े-बड़े भोगो का भोग करनेवाले पुरुषों में भी भ्ोगक्राल समाप्त
हो जाने पर जिन लोगों ने भोग नहीं किया है ऐसे अन्य पुरुषों की अपेक्षा कोई विशेषता नहीं
दीखती, यह कहते हैं /
जिन-जिन पुरुषों ने अत्यन्त रमणीय भोगों का चिरकाल तक इस संसार में खूब भोग किया,
उन सब पुरुषों के मध्य में किसी के भी मस्तक के ऊपर पैदा हुआ कल्पतरु वृक्ष आज तक किसी
से नहीं देखा गया, जिससे कि वह पुरुष उस कल्पतरु की छाया में सदैव पूर्णकाम होकर विश्राम
करता रहे और न उसके पैर में आकाश में उड़नेवाला विमान आदि ही कोई पैदा हुआ देखा गया,
जिससे कि वह सदा ही सर्वत्र विहार करता रहे