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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 32

इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग साधुओं के समागम और सत्‌ शास्त्रों का विचार करनेवाले पुरुष को मोक्ष अवश्य ही होता है, इसलिए मोक्ष स्वाधीन है, इसका युक्ति पूर्व कथन ।

27 verse-groups

  1. Verse 1यदि मनुष्य के पास विद्या या अविद्या हैं, तो उमप्चके लिए मोक्ष या ससार स्वाधीन है, यह वर्ण…
  2. Verse 2श्रीरामजी, भले ही वह जगद्भ्रम उत्पन्न-सा हो जाय, परन्तु उसमें ब्रह्मरूपता का ज्ञान यदि कर…
  3. Verse 3जैसे आँख अपनी चहल-पहल से रूप का अनुभव प्राप्त करती है, वैसे ही चिति चहल-पहल से ही जगत्‌ क…
  4. Verse 4उत्पन्न होते हुए भी सारम खेद का कारण नहीं हैं, यह जो कहा गया है, उसका उपपादन करते हैं । भ…
  5. Verse 5यह जो चिति का बाह्य पदार्थों की ओर प्रसरण है, वह तो अनुभव से ही सिद्ध है, विद्या से जब उस…
  6. Verse 6कथित न्याय भीतर के अहम्भाव में भी समान ही है, यह दिखलाते हुए बन्ध और मोक्ष में स्वाधीनता…
  7. Verse 7अब मोक्ष में स्वाधीनता का उपपादन करते हैं / वही ध्यान और समाधि है, जो कि विद्या से मूलभूत…
  8. Verse 8यही सिद्धान्त एकमात्र शान्ति का कारण हैं, दूस्सरी-दुस्री कल्पनाओं में तो केवल वावियों का…
  9. Verse 9जिस पुरुष की कुति बहिर्मुख हैं, वह पुरुष उस तरह असत्‌ भी दुःख का निवारण नहीं कर सकता जिस…
  10. Verse 10जिस पुरुष की वासना हट गई है, वह पुरुष तो नींद ले रहे पुरुष के सदुश प्रारब्ध प्राप्त दुःख…
  11. Verse 11उपयुक्त सिद्धान्त से यही झलका कि वाग्रनाओं की वृद्धि से जैसे ससार का अनुभव होता हैं, वेसे…
  12. Verse 12अत्यन्त तनुता को (क्षीणता को) प्राप्त वासना ही ऐसे मुक्तिरूप बन जाती है, जैसे आकाश में मे…
  13. Verse 13वासना के उच्छेद में कौन उपाय है 2 इस प्रश्न पर कहते है / जैसे पण्डितो के संसर्ग से बढ़े ह…
  14. Verse 14करो तक आत्मा के ज्ञान को बढ़ाना चाहिए 2 इस प्रश्न का उत्तर यही ह कि जब तक आत्मा का ज्ञान…
  15. Verse 15वायु में कल्पित द्रव्य ओर क्रिया की नाई इस आत्मा में यह सब जगत्‌ जीव आदि कल्पित ही हे । व…
  16. Verse 16अहंकार आदि की सत्ता का त्रैकालिक अभाव ही मोक्ष है, अतः इतने को लेकर मूढता का अवलम्बन क्यो…
  17. Verse 17जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है, जैसे दिवस से रात्रि नष्ट हो जाती है, वैसे ही तत्त…
  18. Verse 18भद्र, मैं कौन हूँ यह प्रपंच किस तरह आया, जीव कौन है, प्राणधारणरूप जीवन का क्या स्वरूप है…
  19. Verse 19वह विचार युरुणी की सेका करने से सफ़ल हो जाता हैं, यह कहते हैं / श्रीरामजी, जो तत्त्वज्ञरू…
  20. Verse 20जब अनेक विद्वान्‌ ओर अनेक तार्किक पुरुषों की मण्डली जुट जाय, तब मैं यह कैसे जान सकता हूँ…
  21. Verse 21भले ही वादरूप पिशाचिनी उत्पन्न हो, इसमें क्या दोष है 2 इस पर कहते हैं / जब वादरूपी यक्ष उ…
  22. Verse 22इसलिए प्रत्येक पण्डित के पास जाकर एकान्त मेँ बुद्धिमान्‌ पुरुष को उसकी सेवा करनी चाहिए, प…
  23. Verse 23पण्डितो की उक्तियों के (वचनं के) अर्थो की अपनी बुद्धि द्वारा श्रुति, युक्ति स्वानुभव एवं…
  24. Verse 24इक्रीसे तत्वज्ञान का उद्य और उससे अज्ञान का उच्छेद हो जाता है यह कहते हैं / तत्त्ज्ञानियो…
  25. Verse 25मेरे कटे ग्रये क्वनो में आप असम्भव की शका न करे यह कहते है/ हे रामभद्र, मैंने जो कुछ अर्थ…
  26. Verse 26जो समस्त कल्पनाओं से परे ह वही असली तत्व है, असली वस्तु की तन्मयता बन जाने पर सारे जगत्‌…
  27. Verse 27आकाश एवं समुद्र स्थल में द्वैतपन रहता हैं, इसलिए उनमें इष्ट क्षति एवं अनिष्ट प्राप्ति की…