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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

नाहमस्तीह मद्युक्त्या निश्चयोऽन्तः शमात्मकः । जीवतोऽजीवतश्चास्ति रूढबोध इति स्मृतः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

करो तक आत्मा के ज्ञान को बढ़ाना चाहिए 2 इस प्रश्न का उत्तर यही ह कि जब तक आत्मा का ज्ञान ढ़ न न बन जाय, तब तक; इस अभिप्राय को लेकर दढ बोधका (ढ़ आत्मज्ञान का) लक्षण कहते हैं / भद्र, मेरी युक्ति का अवलम्बनकर यानी भै" ब्रह्मस्वरूप हूँ” इस प्रकार की दृढ़ अभ्यस्त ब्रह्मभावना का अवलम्बनकर इस संसार मेँ जीवित या परलोकगत योगी के अन्दर “अहंशब्दार्थ जीव नहीं है” यह जो शमात्मक निश्चय उत्पन्न होता है, वही रूढ बोध कहा गया है