Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

असदाश्रयते दुःखं स्वप्नवद्धनवासनः । रूपालोकमनस्कारान्संकल्परचितानिव ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस पुरुष की कुति बहिर्मुख हैं, वह पुरुष उस तरह असत्‌ भी दुःख का निवारण नहीं कर सकता जिस तरह असत्‌ रुपादि के अनुभव का निवारण नहीं कर कता अर्थात्‌ उम्र पुरुष के लिए दुःख दुर्निवार ही है, परन्तु जिस पुरुक की अन्त्ुख वृत्ति है, वह पुरुष तो प्राख्ध प्राप्त दुःख का अनुभव करते हुए भी अपने आत्मानन्द में ही मस्त रहता है, अतःआत्मानन्द के अनुभव से आच्छादित हुआ दुःख भोगा जा रहा भी उसके लिए अश्रुक्त-सा ही रहता हैं, यह कहते हैं / भद्र, दृढ़ वासना से युक्त पुरुष स्वप्न के सदृश असत्‌ दुःख का उस तरह अनुभव करता है, जिस तरह संकल्प से रचित असत्‌ रूपालोक तथा मानसिक दुःख आदि का यानी बाह्य एवं आभ्यन्तरिक पदार्थों का अनुभव करता है