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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अहंभावोऽपि दुःखार्थमहमित्येव वेदनात् । अवेदनान्नाहमतः स्वायत्ते बन्धमुक्तते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

कथित न्याय भीतर के अहम्भाव में भी समान ही है, यह दिखलाते हुए बन्ध और मोक्ष में स्वाधीनता प्रिद्ध हो यह; यह कहते हैं । भद्र, जब भीतर अहम्भाव ज्ञान होने लग जाता है, तब उससे अहम्भाव भी दुःख का ही कारण होता है और जब अहम्भाव का परिज्ञान नहीं होता तो वह दुःख का कारण नहीं होता, अतः बन्धन और मुक्ति अपने ही अधीन है