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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

यो यो बोधातिशयवांस्तं तं पृथगुपास्व भो । संगमे कथयोदेति तेषां वादपिशाचिका ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जब अनेक विद्वान्‌ ओर अनेक तार्किक पुरुषों की मण्डली जुट जाय, तब मैं यह कैसे जान सकता हूँ कि यह विद्वान्‌ है और यह तार्किक हैं ? इस पर कहते हैं / हे भद्र, जो-जो अपने से अधिक ज्ञानवान्‌ हों उन-सबकी अलग-अलग संगति कीजिये । उनका संगम होने पर परस्पर विरुद्ध युक्ति का जब कथन होगा, तब उससे वादरूपी पिशाचिनी उत्पन्न होगी