Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
इदं हि सर्वं मृगतृष्णिकाम्बुवन्निरामये ब्रह्मणि शान्त आतते ।
विचारिते नाहमितीह विद्यते कुतः क्व कस्मान्मननादिविभ्रमः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश एवं समुद्र स्थल में द्वैतपन रहता हैं, इसलिए उनमें इष्ट क्षति एवं अनिष्ट प्राप्ति की
किसी तरह शंका हो भी सकती है, परन्तु विद्वान् पुरुष तो कूटस्थ अद्रय परमात्मरूप हो गया हैं,
अत: उसमें इन श्रमात्मक पदार्थों से इष्टक्षाति एवं अनिष्ट प्राप्ति की शंका ही नहीं हो सकती, इस
आशय से कहते हैं ।
समस्त विकारों से शून्य एवं परिपूर्णस्वरूप आत्मा का जब विचार कर लिया यानी तत्त्वज्ञान
हो गया, तब यह सारा जगत् और अहम्भाव मृगतृष्णा जल के सदृश अस्तित्व रख ही नहीं
सकता, ऐसी स्थिति में इस तत्त्वज्ञ पुरुष में मनन आदि भ्रान्ति कर्होँ से आ सकती है या कहीं
पर क्यो रह सकती है ?